आइंस्टीन कहते थे कि ईश्वर एक्सपैंडिंग यूनिवर्स है अर्थात् यह लगातार फैलता हुआ ब्रह्मांड। लेकिन हमारा ईश्वर मूर्तियों में और मंदिरों में बंद है। या तस्वीरों में जड़ दिया गया है। हमारे लिए वह किसी खिलौने की तरह है। पुजारी और भक्त अपने इस भगवान को खिलाते हैं, उसका श्रृंगार करते हैं, उसे सुलाते हैं, पंखा करते हैं। जैसे छोटे बच्चे गुड्डे-गुड्डिओं की शादी करते हैं, उसी प्रकार ये भक्त जन भी अपने भगवान का ब्याह करते हैं, उनका जन्मोत्सव मनाते हैं वगैरह-वगैरह।

हमारा ईश्वर हमारे अपने ही हाथों से बनाया हुआ है, इसलिए हम उसके साथ चाहे जो खिलवाड़ कर लें। यह ईश्वर हमारे स्वार्थों को सहारा देता है। हमारे लोभ और द्वेष का पोषण करता है। हमारा ईश्वर जनमता है और मरता है। इसीलिए एक दार्शनिक ने कहा है कि ईश्वर मर गया है, तभी तो इतने दुष्कर्म इस संसार में हो रहे हैं। आज आदमी की हालत देख कर लगता नहीं कि ईश्वर कहीं जिंदा होगा।यहां की श्रद्धा, अंधविश्वास में बदल चुकी है। इसी वजह से हम असली ईश्वर को समझ नहीं पाते। हम ईश्वर को 'मैनेजिबल' बना कर पेश करते हैं। यानी तुम हमारे फलां-फलां दुख दूर करो, फलां-फलां इच्छाएं पूरी करो और बदले में हम तुम्हारी इस-इस तरह से पूजा करेंगे और ये-ये चढ़ाएंगे।

हमें ईश्वर नहीं, एक कमीशन एजेंट चाहिए- ये-ये काम करो उस्ताद, इतना प्रतिशत कट दे दूंगा। इसके लिए हर घर, मोहल्ले, गली और गांव में एक चमत्कारी 'मैनेजिबल' ईश्वर बना लिए हैं। फिर यह भी प्रचारित करते हैं कि कौन कितना जाग्रत देवता है -यानी कितना काम करा देता है

पुजारी कहते हैं कि, ईश्वर से डरो। लेकिन ईश्वर तो प्रेम का प्रतीक है, आनंद देने वाला है, डरने की कोई वजह नहीं है। अब हमारे मन में ईश्वर के प्रति प्रेम भी है और भय भी है। लेकिन इस प्रकार तो हमारा ईश्वर दोमुंहा हुआ, क्योंकि जहां प्रेम है वहां भय नहीं होता। इसलिए पुजारी का कथन सच नहीं है।

ईश्वर चैतन्य सत्ता है जो अनुभवगम्य है। जो ईश्वर हमारे हृदय में विराजमान है, उस तक हम पहुंच नहीं पाते। इसी को कृष्ण ने गीता में समझाया है कि इस संपूर्ण सृष्टि में मैं ही हूं, ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं, ऐसी कोई जगह़ नहीं है जहां मैं नहीं हूं। -ऐसे ईश्वर को जान लेने पर हम उसके नाम पर हो रहे पाखंड व अंधविश्वास से बच सकते हैं।आर. डी. अग्रवाल नवभारत टाइम्स

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