जब जिंदगी रूठ जाया करती हैं हमसे 
बिछड़ जाती हैं राहें और मुँह फेर लेहाँ तुम ही तो हो 
मेरा एक अधूरा हिस्सा उस पल ठहरा रहा तू मेरी साँसों पे 
जैसे पत्तों की कोर पे एक बूँद ओस साँसे उलझी उलझी सी अंखियों मैं नमी नमी सी

जाने कौन अजब सी बात की हमतन्हाई मैं भी तुम मेरे पास हो
भीड़ में भी एक ख्याल बन आस पास हो
जब भी गुजरहम अक्सर शोहरत की चाह में जिंदगी के छोटे छोटे पलों में छुपी खुशियों को नज़रअंखो गया है कहीं तो बचपन 
ढूँढने निकला उसे उन गलियों मेंअब कँटीले रास्ते पर चल रही है ज़िन्दगी,
जैसा है माहौल वैसा ढल रही है ज़िन्दटहल रहे थे अकेले गीली रेत पर 
समुंदर के किनारेदिल को आज मेरे फिर खो जाने दो, नादान है ये इसे समझाने दो
याद है आई उनकी आजखो गया है कहीं तो बचपन 
ढूँढने निकला उसे उन गलियों में


तेरी जुदाई का शिकवा करूँ भी तो 
किससे करू 

यहाँ तो हर कोई 
अब भी
मुझे 
तेरा 
समझता हैं।

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